जनता धर्म से ही चलती थी तो सत्ता को उसे अपने अनुरूप ढालना कॉमन सेंस की बात है.

#शास्त्रों #में #मिलावट

फेसबुकिया विद्वानों से अक्सर यह वाक्य सुनने को मिलता है कि हमारे शास्त्रों में ‘मिलावट’ की गई है। बहुत दिनों तक सोचने के बाद भी तीन बातें मेरे मन में कभी स्पष्ट नहीं हो सकीं तो सोचा कि फेसबुक पर उपस्थित ज्ञानवारधियों से इस जिज्ञासा का शमन किया जाए।

1– चूँकि यूरोपीय विद्वानों में अधिकतर तो संस्कृत जानते नहीं थे तो संस्कृत में लिखे गए इन शास्त्रों में मिलावट कैसे की गई अर्थात इसका तरीका क्या रहा होगा?

2– ये मिलावटें किस व्यक्ति या संस्था द्वारा संस्तुत व स्वीकृत की गई?

3– इन मिलावटों को देख पढ़ रहे विद्वान चुप क्यों बैठे रहे? या उत्कोच ने उनके मुँह बंद कर दिए थे।

अगर कोई विद्वान इन जिज्ञासाओं का शमन करे तो आभारी रहूँगा।

शेष शुभ!7——————-

मिलावट ना हो ये असंभव है, हर किसी ने मिलावट की (करवाई ) होगी स्वार्थी राजाओं/ब्राह्मणों ने, अंग्रेजों ने, राजा/ब्राह्मण का उद्देश्य अपनी सत्ता को मजबूत करना अपने को सर्वोपरि दिखा के व अंग्रेजों को अपनी सत्ता को मजबूत करना समाज में फूट डाल कर.

क्योंकि जनता धर्म से ही चलती थी तो सत्ता को उसे अपने अनुरूप ढालना कॉमन सेंस की बात है.

बाकी मिलावट या ना मिलावट, हर चीज़ से उपयोगी हिस्से को निकालना व अनुपयोगी को नकारना ही समझदारी है.महाभारत के पूर्वरम्भ में 25000 श्लोक थे आज 1 लाख है…
एकता कपूर की महाभारत तो सबकी बाप है उसमें भी और आजकल कर्णसंगिनी चलाया जा रहा है नया नाटक…
खेर एक उदाहरण और हे मैक्समूलर द्वारा अनुवादित वेद का एक श्लोक है जिसमे नास मदीना लिखा है जिसका अर्थ जाकिर नायक के अनुसार मदीना का वर्णन है
पर एक संस्कृत के ज्ञाता को जब ये पंक्ति बतायी तो उन्होंने कहा ये पूरा शब्द नसंदिना है…
मूल संस्कृत ग्रंथ आज भी काशी में लोग पढ़ते है पर अफसोस वो सोशल मीडिया पर नही है…सबसे पुराना उदाहरण है बौद्धो जैनों आर्य समाजियों ने कुछ वैदिक संस्कृतज्ञ ब्राह्मणों को पारितोषिक दे कर उन से बौद्ध दर्शन लिखवाया विधर्मियों की ऐसी ही परंपरा रही है जो आज नकली शंकराचार्य तक आ पहुंची है,बौद्ध जैन आर्य समाज आदि के दर्शन को लिखने वालों का इतिहास देखिये, बहुधा सनातन के पीछे खड़ा हो उसको पेलता वैदिक ब्राह्मण ही दिखेगा,और रही बात अन्य विद्वानो के चुप रहने की तो इसका कारण होता है राज्य या राजा मोदी ही खतना करवाने इच्छुक हो तो पुरी पीठाधीश्वर क्या और कितना कर सकेंगे ?दूसरा बिंदु ये कि क्या जो लिखा है उसे ज्यों का त्यों माना जाना चाहिए ! इस मामले में ‘पुराणविमर्श’ के लेखक पंडित बलदेव उपाध्याय [इनका ज़िक्र मैंने पहले भी किया था] ने बल्लालसेन के ‘दानसागर’ का उल्लेख किया है। बंगाल के बल्लाल्सेन बारहवीं शाताब्दी में एक ग्रंथ ‘दानसागर’ लिख रहे थे। इस ग्रंथ में वे पुराणों के कुछ हिस्सों को प्रमाण मानते हैं कुछ को नहीं मानते। इस बात की वजह भी गिनाते हैं कि मैं फलाँ पुराण के अमुक हिस्से को प्रमाण क्यों नहीं मानता। अब इस घटना से यह बात सीखने की है कि आठ सौ साल पहले भी एक विद्वान पूरे ढाँचे को ‘एज़ सच’ आँख बंद करके नहीं मान लेता। वो आलोचनात्मक ढंग से कुछ हिस्सों को लेता है -कुछ को नहीं लेता। याद रहे कि आर्यसमाज के संस्थापक विद्वान दयानन्द जी इस पूरे पौराणिक ढाँचे से इतने खफा हुए कि पूरे मामले को एक झटके में निरस्त कर दिया। नतीजा ये हुआ कि आर्य समाजी हलकों में ‘पौराणिक’ होना एक गाली हो गया। वो दूसरी अति पर चले गए। जो मेरे हिसाब से ठीक नहीं थी। तीसरी बात ये कि जो आपके लिए ‘प्रक्षेप’ है वो हो सकता है दूसरे को न लगे। मस्लन तंत्र संबंधी हिस्से वैष्णव को पसंद नहीं आये तो उसे वो ‘प्रक्षेप’ लगेंगे !शाक्त को नहीं लगेगा। लेकिन पुराण एक सम्प्रदाय की फ़िक्र नहीं करता। वो ‘इन टोटल’ देखता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *