आखिर उस फाइल में ऐसा है क्या जिसे उजागर करने में सभी प्रधानमंत्री, यहाँ तक कि भाजपा के प्रधानमंत्री भी डर जाते हैं?

नेता जी के साथ देश के प्रमुख नेता नेहरू गांधी ने गद्दारी की थी नेताजी की रणनीति दुश्मन देश के दुश्मन देश से दोस्ती कर स्वयं स्वतन्त्र होने की थी न कि कम्युनिज्म या तानाशाही की।यद्यपि वो जर्मनी रूस से भी मदद मांगे पर सबसे महत्वपूर्ण मदद जापान ने ही कि थी।आजाद हिंद फौज जिसकी नींव रासबिहारी बोस रख चुके थे अलग नाम से,उस पर भव्य इमारत सुभाष बाबू ने बनाई जिसने भारत को अंग्रेज से मुक्त कराने हमला भी किया और जीता भी देश।पर उसी समय जापान के फौजी जनरल आपस मे समन्वय नही रख पावे।
और ब्रिटिश सेना के भारतीय लोग भी ब्रिटिश के प्रति वफादार रहे बजाय सुभाष बाबू के तरफ जाने के।जबकि उनको पता था कि देश को मुक्त कराने सेना आई है।बहुत से कारण है।गांधी नेहरू ने सेना में हिन्दुओ को भेजे जाने का विरोध किया सुभाष बाबू का विरोध किया कम्युनिस्ट ने अपने अखबारों में उनको तोजो का कुत्ता कहा।केवल सावरकर ही मिल्ट्री केम्प लगाके हिन्दू नवयुवकों को सेना में भेजते थे जिसकी सुभाष बाबू ने बर्लिन रेडियो से प्रसंशा भी की।
थोथे अंहिसा की पोल खुल जाती अगर ये फॉल6 सार्वजनिक हो जाती और हिन्दुओ के आपसी गद्दारी का भी पता चल जाता।मेरे अनुमान से नेताजी के बारे में पुरी ख़बर कोई नही जानता।हर फ़ाइल अधूरी है।
नेताजी किसी दूसरे देश दूसरे व्यक्ति दूसरी विचारधारा के अनुसार चलने वाले व्यक्तित्व नही थे ।दूसरे वे अंदर से आध्यात्मिक थे खाँटी राजनेता नही थे इसलिए वे आज़ादी के लिए राजनीति में गए थे । जब वह एक बार चाहे जैसे भी मिल गयी तो वह फिर बाद की उन परिस्थितियों में (जिसमें उनको नेहरु या कांग्रेस के ख़िलाफ़ राजनीति करनी पड़ती ) ख़ुद को राजनीति से दूर कर लिया क्योंकि वे सत्ता के लिए नव स्वतंत्र देश में विवाद नही चाहते थे -इसलिए रुस पहुँचकर वहाँ से चाहे जैसे भी भारत आ गए और सन्यासी बन गए ।आध्यात्मिक जीवन जीते रहे ।गुमनामी बाबा फ़ैज़ाबाद में १९८५ तक ज़िंदा रहे ।
पर ई सब किसी फ़ाइल में नही है।
इसलिए नेताजी का पुरा सच कभी कोई सरकार नही बता सकेगी ।क्योंकि पुरी दुनिया भ उनकी पुरी जानकारी नही रख पायी ।

पुनःश नेता जी की फ़ाइल अकेली फ़ाइल नही है और न ही भारत अकेला राष्ट्र है जहां, कुछ रहस्य इसलिये नही खोले जाते क्योंकि काल, परिस्थिति व परसेप्शन का सत्य, कभी कभी सम्पूर्ण सत्य बनकर जनता व तन्त्र के बीच के विश्वास की डोर तोड़ देने के खतरे का कारक बन जाता है।

कुछ रहस्य, रोमांस के लिए भी जीवित रक्खे जाते है। अमेरिका का जॉन कैनेडी रोबर्ट कैनेडी मर्लियन मनरो की हत्या/मौत, पाकिस्तान का लियाकत ख्वां, जिया उल हक की मौत, वेटिकन के 1978 में पोप जॉन पॉल 1 की 33 दिन के कार्यकाल के बाद सन्दिग्ध मृत्यु(हत्या) इत्यादि जिनका पूर्ण सत्य लोग जानते हुए भी आधिकारिक रूप से सर्वाजनिक नही कर सकते है।

मैंने इस पर काफी पढ़ा है और मैं समझता हूँ कि नेता जी की फाइल सार्वजनिक न किये जाने के कई कारण है।

सर्वप्रथम तो यह कि नेता जी की फाइल सिर्फ केवल राष्ट्रीय स्तर पर भूचाल लाने वाली होती तो हिम्मत कर जाते लेकिन इसके तार अंतराष्ट्रीय रूप से जुड़े है। नेता जी हमारे लिये नायक थे लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के एक युद्ध अपराधी थे। नेता जी की फाइल केवल उनकी मौत की संभावना की फाइल नही है बल्कि यह फ़ाइल इंग्लैंड, सोवियत रूस की भी फ़ाइल है। यह फ़ाइल नेहरू व पटेल की भी फ़ाइल है। यह फ़ाइल उन तमाम लोगो की भी है जो स्वतंत्रता के बाद प्रतिष्ठित हुये, सम्मानित हुये लेकिन उन सबकी भूमिका 40 के दशक में सन्दिग्ध रही है, ऐसे कई नाम है जिसमे वह लोग भी थे जो आज़ाद हिंद फौज में महत्वपूर्ण पदों पर थे, विशेषकर कर्नल सहगल व कर्नल शहनवाज। यह फ़ाइल बर्लिन स्थित इंडिया सेन्टर की भी जो सुभाषचंद्र बोस के जर्मनी छोड़ जापान जाने के बाद सन्दिग्ध रहा।

इतना झेलना, किसी भी भारतीय नेता की औकात नही है। भारत को सत्य बताने का अर्थ यह है कि कई लोगो को बिल्कुल अलग परिपेक्ष में देखना जो आज के काल मे संभव नही है। मोदी जी की हिम्मत क्यों नही हुई? उसका कारण सिर्फ एक है कि उन्होंने नेहरू के सामने पटेल जी की लंबी लकीर खींची है और 1946 में अंतरिम सरकार के गृहमंत्री, जो वाइस राय माउंटबेटन के अधीन थे, उन पर विवाद होने की पूरी संभावना है।

स्वयं गांधी इस पूरी फ़ाइल में मुझे संदिग्ध नही दिखाई देते है क्योंकि उनकी 30 के दशक के अंत मे निभाई गयी भूमिका, नेता जी को लेकर 40 के दशक में विपरीत थी, जिसे इतिहासकारों ने सफलता पूर्वक छुपाय रक्खा है।

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