अब गो और देवालय सुरक्षित थे। वेद मंत्रों की ध्वनि मंदिरों मठों से पुनः उठने लगी। यज्ञधूम की पवित्र सुगंधि पुनः वातावरण में देवताओं का आह्वान करने लगी।

# Summer_Sales_ is ……

I have always been very sensitive about my words and keeping my words consciously has been my tendency, but where the question is about the future of the nation and Hindutva, any promise, object, relationship, mind, life and even personal Principles also have no value and that is why despite the decision to abandon Facebook forever in extreme anger, hatred and anguish When Iya remember arrived and I do not want these lines apply to me.

‘Summer is remaining, not a sinner, only a hunter,
Those who are neutral, time will also write crime.

I do not even have the slightest misconception that by coming to my Facebook there will be an extra contribution in the victory campaign of Modiji, but my soul will surely feel a satisfaction that I have tried my part.

Remaining, there is a lot to hear and say that will go on.

In reality!3

#Unsung #Heroes 13 (c)

#हक्का #बुक्का
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(गतांक से आगे)

अगला दिन अभूतपूर्व व ऐतिहासिक था।

पूरी सेना के समक्ष दोंनों भाई अपने विश्वस्त अंगरक्षकों से घिरे हुए खड़े थे पर आज उनका वेश परिवर्तित था।
दाढ़ी साफ थी। तुर्की परिधान के स्थान पर धोती, अँगरखा और दक्षिण भारतीय पगड़ी। मस्तक पर चंदन का वैष्णवी तिलक।

सैनिकों में काना फूसी शुरू हो गई जो जल्दी ही कोलाहल में बदल गई। गुरु के संकेत पर बुक्का ने हाथ उठाया और सारा शोर ऐसे शांत हो गया मानो किसी ने जादू की छड़ी घुमा दी हो।

“मेरे सैनिक साथियो, आप जो देख रहे हैं वह सत्य है। मैंने व मेरे अग्रज ने बलात् लादे गये इस्लाम को त्यागकर अपने मूल धर्म में लौटने का निर्णय लिया और विगत रात्रि पूज्य गुरुदेव ने अनुष्ठानपूर्वक हमें हिंदुत्व की पुनःदीक्षा दी है।” बुक्का सांस लेने के लिए रुके।

“मैं जानता हूँ ऐसी स्थिति में हमें उस सेना का नेतृत्व करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं जिसकी निष्ठा पृथक धार्मिक व राजनैतिक उद्देश्यों को लेकर बंटी हुई हो, इसलिये मैं आपके सामने एक चुनाव रखता हूँ।”

“हिंदू सैनिकों के अतिरिक्त यदि धर्मान्तरित सैनिक हिंदुत्व में वापस आना चाहें उन्हें गुरुदेव का वचन है कि हिंदू समाज में उनका तिरस्कार नहीं होगा और शेष मुस्लिम सैनिक वापस दिल्ली जा सकते हैं।”

सैनिकों की भीड़ में फिर कानाफूसी होने लगी।

“संकुचित होने की आवश्यकता नहीं। जो भी वापसी करना चाहे वह आगे बढ़कर हमारे पीछे आ जाये।

कुछ पलों तक शांति रही और फिर एक दक्षिणी मुस्लिम युवक आगे बढ़कर हरिहर और बुक्का के पीछे खड़ा हो गया। फिर तो जैसे बांध टूट गया और धर्मान्तरित हिंदू सैनिकों के रेले पर रेले दोंनों बंधुओं के पीछे आने लगे। अंततः तुर्क और उत्तर मूल के मुस्लिम सैनिकों के अतिरिक्त कुछ स्थानीय मुस्लिम सैनिक दूसरी ओर रह गये।

“आप लोग दिल्ली लौटने के लिये स्वतंत्र हैं, परंतु रास्ते के लिये आवश्यक तलवार व छुरों के अलावा अन्य कोई युद्ध सामग्री अपने साथ नहीं ले जा सकेंगे।” कठोर स्वर में बुक्का ने कहा।

मुस्लिम सैनिकों ने बदली परिस्थिति में इस आदेश को स्वीकार कर लिया।

हिंदू सैनिकों ने उत्साह में नृत्य प्रारंभ कर दिया।

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शिविर में हरिहर, बुक्का व विद्यारण्य के बीच गुप्त मंत्रणा चल रही थी।

“पर गुरुदेव हमने उन्हें उनकी सुरक्षित वापसी का वचन दिया है।” हरिहर ने संकुचित स्वर में प्रतिवाद किया।

“इन मुस्लिम सैनिकों व सेनापतियों में कुछ यहाँ के स्थानीय धर्मान्तरित हिंदू थे जो यहाँ के पग पग से परिचित हैं। क्या तुम चाहते हो कि वे अगली मुस्लिम सेनाओं के पथप्रदर्शक के रूप में आयें?” नितांत ठंडे स्वर में संत ने पूछा।

“पर वे हमारे हैं और अपनों के विरुद्ध ऐसा क्यों करेंगे?”बुक्का ने पूछा।

“तुम भूल रहे हो कि उन्हें एक अवसर दिया गया था पर उन्हें कुरान द्वारा अनुमोदित #जेहाद के माध्यम से काफिरों के विरोध के नाम पर लूट और व्यभिचार का स्वाद लग लग चुका है और वे आत्मनियंत्रण वाली हिंदू पद्धति से भागना चाहते हैं। वे अब मुस्लिमों से भी अधिक खतरनाक हैं।”

“उन्हें मरना होगा। मृत्यु ही उनकी मुक्ति का एकमात्र उपाय है।”विद्यारण्य के स्वर में नियति की अटल गूंज थी।

“पर तुर्क सैनिक….?उनका क्या करें??” बुक्का ने साहस बटोरकर पुनः पूछा।

“क्यों? जब हम अपने पूर्व बंधुओं का मोह त्याग चुके तो ये हमारे लगते ही कौन हैं और वैसे भी ये आगामी आक्रांता मुस्लिम सेना का संख्याबल ही तो बढ़ाएंगे” विद्यारण्य का स्वर व्यंग्यपूर्ण हो उठा।

“जैसा आप आदेश देंगे वैसा ही होगा गुरुदेव।” दोंनों भाइयों के स्वर अब निर्द्वंद थे।
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दक्षिण के घने जंगलों में बाणों व भालों की एक वर्षा हुई और चीत्कारों व कराहों से जंगल गूंज उठा और कुछ घंटों बाद एक सामूहिक चिता धधक उठी जिसमें हजारों मृत तुर्क व अधम धर्मान्तरित हिंदुओं का नामशेष भी नहीं रहा।

कुछ ही दिनों बाद विद्यारण्य के प्रस्ताव पर महाराज वीर बल्लाल तृतीय ने अपने भतीजे बलप्पा दंडनायक से हरिहर की पुत्री का विवाह तय कर दिया।

अब राजपरिवार का अंग बन जाने के कारण वीर बल्लाल तृतीय ने हरिहर व बुक्का के उत्तरी कर्नाटक पर अधिकार को मान्यता दे दी। इस तरह उनके अहं की संतुष्टि और सम्मान की रक्षा हो गई।

विद्यारण्य ने कंपिली का प्राचीन सिंहासन गुप्त स्थान से मंगवा लिया और तुंगभद्रा के उत्तरी तट पर #अनेगुंडि को अस्थाई राजधानी घोषित कर उस प्राचीन पवित्र सिंहासन पर हरिहर का वैदिक रीति से राज्याभिषेक कर दिया। स्वयं विद्यारण्य ने प्रधानमंत्री का पद संभाला।

साम्राज्य के विभिन्न भागों का प्रशासन पांचों भाई मिलकर संभाल रहे थे–

1- हरिहर – केंद्रीय प्रशासन
2- बुक्का – प्रधान सेनापति
3-कंपन – नेल्लूर के नायक
4-मुदप्पा – मुल्बगल के नायक
5- मरप्पा-चंद्रगुटटी के नायक

विद्यारण्य के स्वप्नों का साम्राज्य आकार ले रहा था पर उन्हें अभी चैन नहीं था।

एक ओर तो मदुरै में 1335 में स्थापित इस्लामी सल्तनत उन्हें अपने वक्ष में घुसे खंजर की भांति प्रतीत होती थी तो दूसरी ओर देवगिरि स्थित मुस्लिम छावनी से कभी भी आक्रमण हो सकता था। ऐसी स्थिति में उन्होंने एक दाँव खेला।

उन्होंने अपने छोटे भाई सायण को द्वारसमुद्र भेजकर वीर बल्लाल को मदुरै के सुल्तान पर आक्रमण के लिए उकसाया ताकि प्रजा में उनकी छवि भी संगम बंधुओं की भांति धर्मरक्षक की बने।

बेचारा बूढा वीर बल्लाल चारा निगल गया।

“अगर वीर बल्लाल जीतता है तो तुम दक्षिण की ओर से सुरक्षित हो जाओगे।” विद्यारण्य ने मुस्कुराते हुए कहा?”

“अपने सैन्य अनुभव के आधार पर मेरा निश्चित मत है कि उनका जीतना असंभव है गुरुदेव।” हरिहर ने कहा।

“तो पूरा हौयसल साम्राज्य तुम्हारा”, विद्यारण्य के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान खेल गई।
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हरिहर की आशंका सत्य निकली।1343 में वीर बल्लाल न केवल पराजित हुए बल्कि युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। विजेता सुल्तान गयासुद्दीन मुहम्मद दमघानी ने बर्बर इस्लामी परंपरा के अनुरूप उनकी मृत देह को भूसा भरकर अपने राज्य में प्रदर्शित किया।

हरिहर और बुक्का ने त्वरित निर्णय लिया और तुरंत अपनी सेनायें दक्षिणी कर्नाटक की ओर भेज दीं। मदुरै का सुल्तान युद्ध जीतकर भी उसका लाभ नहीं उठा सका जबकि मदुरै के सुल्तान के आक्रमण से डरी हुई हौयसल साम्राज्य की प्रजा को संगम बंधु ईश्वर के भेजे हुए देवदूत प्रतीत हो रहे थे।

वीर बल्लाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी ‘विरुपाक्ष बल्लाल’ की भी 3 वर्ष के लघु शासन के बाद 1346 ई. में ‘रहस्यमय मृत्यु’ हो गई।

विरुपाक्ष की मृत्यु के कारण साम्राज्य में अशांति व विखंडन का वातावरण व्याप्त हो गया और यहाँ तक कि राजपरिवार में भी आंतरिक षडयंत्र प्रारंभ हो गए।

मौका देखकर विद्यारण्य ने साम्राज्ञी #कृष्णायतै को श्रृंगेरी मठ में साम्राज्य के हित में मिलने का प्रस्ताव भेजा। विधवा महारानी ने स्वीकार कर लिया।

श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य भारती तीर्थ की प्रतिभूति पर विद्यारण्य ने राजपरिवार की पूर्ण सुरक्षा और अपार धन के साथ उनके सुरक्षित भविष्य का प्रस्ताव किया और उसके बदले हरिहर को साम्राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने की शर्त रखी। परिस्थितियों व अनिश्चित भविष्य से डरी साम्राज्ञी ने स्वीकार कर लिया।
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“गुरुदेव राजधानी क्या होगी? द्वारसमुद्र या कुमामता?” हरिहर ने पूछा।

“दोंनों में से कोई भी नहीं” विद्यारण्य पूर्णतः स्पष्ट थे।

“क्यों गुरुदेव?”

“द्वारसमुद्र और कुमामता में तुम्हारी सत्ता वहाँ के मानचित्र, नगरीय रहस्यों से अपरिचित होगी और तुम वहाँ ईर्ष्यालु नायकों के बीच होगे जो तुम्हारी नवजात सत्ता के लिये निरापद नहीं होगा।”गुरु का स्वर गंभीर था।

“फिर कहाँ, गुरुदेव?”

“हरिहर तुम्हें याद है वह जगह, वह मैदान जहाँ कुछ वर्ष पूर्व हमने एक #शशक_को_श्वान_पर_आक्रमण_करते देखा था?”

“आप हंपी के मैदान की बात कर रहे हैं गुरुदेव? वहां पर एक छावनी और कुछ निर्माणकार्य स्वर्गीय सम्राट वीर बल्लाल ने पूर्व में 26 वर्ष पूर्व में करवाये थे।अब तो वहां एक छोटी सी बस्ती बस चुकी है।”

“हाँ, वह भविष्य का एक संकेत था। वहीं पर एक नया नगर बसाओ। वही नगर बनेगा तुम्हारी राजधानी।”

“हाँ गुरुदेव, हम उसका नाम रखेंगे #विद्यानगर।” उत्साहित स्वर में बुक्का बोल उठे।

“नहीं।”विद्यारण्य कठोर स्वर में बोल उठे,”व्यक्तिपूजा के लिये इस साम्राज्य में कोई जगह नहीं होगी। किसी भी
व्यक्ति की यहाँ तक कि सम्राट की भी पूजा इस साम्राज्य में नहीं होगी। अनुपयोगी होने पर सम्राट को भी सिंहासन से हटाने में कोई संकोच नहीं किया जायेगा।”

“यह साम्राज्य हिंदुओं की विजय का उनके सात्विक प्रतिशोध की विजय का स्वरूप है इसलिये इस नवीन राजधानी का नाम होगा #विजयनगर।” संत की आंखों में सात्विक तेज लहरा रहा था।

पांचों बंधु नतमस्तक थे।
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10 वर्ष पश्चात– सन 1371ई.

“पुत्र कंपन, तुम्हारे ज्येष्ठ पिता और स्वर्गीय सम्राट हरिहर जिस कार्य को पूरा ना कर सके उसे तुम्हें पूरा करना है।” युवक के मस्तक पर विजय तिलक करते हुये वृद्ध परंतु दृढ़ विद्यारण्य ने आशीर्वाद दिया।

“विजयी होकर लौटना पुत्र, यह एक सैन्य अभियान मात्र नहीं बल्कि तुम्हारे स्वर्गीय ताया सम्राट हरिहर का अधूरा स्वप्न और गुरुदेव को हमारी गुरुदक्षिणा का शेष भाग है।” महाराज बुक्का ने अपने इस ज्येष्ठ पुत्र को गले लगाते हुए कहा।

राजकुमार कंपन अब राजमाता की ओर मुड़े।उनसे आशीर्वाद लिया और पत्नी गंगादेवी से नयनों में ही मूक विदा मांगी और वापस मुड़े।

“एक पल रुकिये।” गंगादेवी ने पति को धीरे स्वर मे रोका।
कुमार कंपन ठिठके और पीछे मुड़े। युवराज्ञी ने पार्श्व में खड़ी दासी को संकेत किया जिसने रक्तवर्णीय वस्त्र में ढंका थाल आगे कर दिया।

कंपन पत्नी के सामने आकर खड़े हो गये। गंगा ने थाल पर वस्त्र हटा दिया। सामने एक विकराल खड्ग थाली मे अनावृत रुप में उपस्थित था।

“इसे साधारण खड्ग नहीं बल्कि साक्षात माँ दुर्गा का खड्ग समझिये। यह युद्धभूमि में आपकी रक्षा करेगा।”पति को खड्ग देते हुए तेजोमय वाणी में गंगा बोली।

“तुम्हें ये कैसे प्राप्त हुआ?” खड्ग को माथे से लगाकर कमर में बांधते हुए कंपन ने पूछा।

सदैव की भांति गंगा ने रहस्यमय मुस्कुराहट के साथ मौन धारण कर लिया। सभी गंगा की दुर्गाभक्ति, काव्यप्रतिभा और उसके रहस्यमय स्वभाव से परिचित थे।

सेना के जयघोष के साथ कुमार कंपन ने प्रस्थान किया।
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कुमार कंपन ने चतुराईपूर्वक पहले चोलवंश के स्थानीय #संबुवराव राजवंश को मिलाया और फिर मदुरै पर भयानक आक्रमण किया।

कुमार कंपन के हाथों में माँ दुर्गा का खड्ग कहर ढा रहा था। उत्तर भारत के नगर मथुरा की स्मृति दिलाती पवित्र मदुरै की भूमि से पापी म्लेच्छों का सफाया हो रहा था।माँ मीनाक्षी अपने मंदिर से इस पुत्र का शौर्य देखकर गर्वित थी।

सुल्तान सिकंदर शाह की पूर्ण पराजय हुई। कुमार कंपन की पूर्ण विजय हुई। इस पावन विजय स्मृति के रूप में श्रीरंगम मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। परंतु स्थानीय धर्मान्तरित मुस्लिमों की बड़ी संख्या और संबुवराव राजवंश पर नियंत्रण रखने हेतु सिकन्दरशाह को कठपुतली बनाकर रखा गया और सल्तनत का विजयनगर साम्राज्य में पूर्ण विलय 1378 ई. तक के लिये स्थगित रखा गया।

और इस तरह विजयनगर साम्राज्य का संगठन पूर्ण हुआ।

विद्यारण्य का स्वप्न पूर्ण हुआ। उनका गुरु व स्वयं को दिया वचन पूर्ण हुआ। अब उत्तर से होने वाले मुस्लिम खतरे जो अब #बहमनी #सल्तनत के रूप में आक्रामक रूप में संगठित हो चुके थे, के विरुद्ध एक ठोस हिन्दू प्रतिरक्षा दीवार उपस्थित थी।

अब गो और देवालय सुरक्षित थे। वेद मंत्रों की ध्वनि मंदिरों मठों से पुनः उठने लगी। यज्ञधूम की पवित्र सुगंधि पुनः वातावरण में देवताओं का आह्वान करने लगी।

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1372 ई.

विद्यारण्य ने श्रंगेरी मठ लौटकर भारती तीर्थ की मृत्यु के पश्चात रिक्त हुए शंकराचार्य पद को स्वीकारने का निश्चय सम्राट को बता दिया।

विदाई सभा में सम्राट बुक्का भावुक थे पर गुरु सदैव की भांति दृढ़ थे। अंततः विद्यारण्य उठे, सम्राट को, नवनियुक्त प्रधानमंत्री सायण और सभी को आशीर्वाद दिया और गेरुए कपड़ों में लिपटे ताड़पत्रों की एक गठरी सम्राट को सौंप दी।

“इसमें क्या है गुरुदेव?” सम्राट ने पूछा।

“इसमें विजयनगर का भविष्य है राजन। हिंदू जाति के पतन व पराजय के कारणों व निदान का मैंने वर्षों तक अनुसंधान किया है और निष्कर्षों को इस ग्रंथ में लिख दिया है।” गुरु सांस लेने के लिए रुके,

“जब तक विजयनगर के सम्राट और प्रजाजन इस संहिता का अनुकरण करते रहेंगे सुरक्षित रहेंगे और जब वे इसे भूल जायेंगे उनका विनाश देवता भी रोक नहीं पाएंगे।” उनके स्वर में मानो भवितव्यता बोल रही थी।

सम्राट ने आवरण उठाकर ग्रंथ के प्रथम पृष्ठ को देखा जहां शीर्षक चमक रहा था– #प्रायश्चित्त #सुधानिधि

गुरु सिंहद्वार पर अंतिम रूप से मुड़े और सबको हाथ उठाकर सामूहिक आशीर्वाद दिया और चलते चले गये अपना शेष कर्तव्य पूरा करने और पीछे रह गए सिर्फ उनके चरणचिन्ह।
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#स्रोत

A– विदेशी यात्रियों से मिलने वाली प्रमुख जानकारी

1. रेह्लातर तुह्फत-उन-नुज्ज़त (इब्न बतूता): हरिहर प्रथम के अधीन विजयनगर साम्राज्य का विवरण।

2. अब्दुर रज्ज़ाक: मतला उस सादेंन वा मजमा उल बहरीन

3. डुआर्टे बार्बोसा का विवरण

4. डोमिंगो पेस का विवरण

5. फ़नानाओ नुनीज का विवरण

B– साहित्यिक स्रोत:–

1. अल्लासानी पेडन द्वारा रचित मानचिरितम

2. गंगाधर द्वारा रचित गंगदास प्रताप विलासम

3.गंगैय्या रचित कुमार रामचरित

4.नजदुप्पा रचित बल्लाल रायन युद्ध

C–शिलालेख (अभिलेख):–

1. बितरागुंता ग्रांट ऑफ़ संगमा II: पांच संगमा बंधुओ के वंशावली की व्याख्या करता है।

2. बगापेल्लिसी का तांबे से बना शिलालेख: हरिहर प्रथम की उपलब्धियाँ

3. हरिहर द्वितीय के चन्ना राया पटेका शिलालेख में बुक्का1 के सफल अभियानों के बारे में बताता है।

4. देवराय द्वितीय के श्रीरंगम का तांबे से बना शिलालेख बुक्का I की उपलब्धियों का वर्णन

D– आधुनिक इतिहासकार

1– रॉबर्ट सीवेल:-फॉरगोटन एम्पायर

2– के.ए. नीलकंठ शास्त्री:- दक्षिण भारत का इतिहास

3– द कैफियत ऑफ कंपिली

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